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Wednesday, December 17, 2014

निर्भया तुम निर्भय नहीं निर्भयता की मशाल हो

निर्भया तुम निर्भय नहीं निर्भयता की मशाल हो
तुम १६ दिसंबर की रात, चली थी बस में हो सवार
अपनी ज़िन्दगी सुकून में जी रही थी,
सुनहरे सपने आँखों में पिरो रही थी
अचानक ज़िन्दगी का पलड़ा पलटा
संसार से बिदाई का समय आ थमका
ये बिदाई भी तारों की छाओं में थी
लेकिन शहनाई और सारंगी नहीं
सिसकियाँ और तन्हाई ही थी

रावण के भेस में राम सिंह ने '
अपनी सेना साथ
तुमपे किया निर्लज हो प्रहार
तुम राक्षस सेना से झूँझथि रही
चीखती रही, बिलखती रही
वो सिसकियाँ उन कानों से अनसुनी रह गयी
तुम्हारी हालत देख भयभीत ये दुनिया
शर्म से झुख गयी और
तुम्हें निर्भया पुकार कृतज्ञ कर गयी??
निर्भया मैं जानती हूँ तुम्हारा भी सपना था
लाल रक्त में नहीं लाल जोड़े में विदा होना था
निर्भया तुम निर्भय नहीं निर्भयता की मशाल हो

तुम्हारे जाने के बाद, दिल्ली की सड़के हैवानी लगती हैं
आज हूँ कल नहीं, ये अब रोज़ की परेशानी लगती है
कल तक लड़की होने पे गरूर करती थी
आज लेकिन इस रूख में भयभीत रहती हूँ

निर्भया मेँ चाहूँ भी तो तुमको निर्भया नहीं कह सकती
क्यूंकि तुम किसी युद्धभूमि में नहीं उतरी थी
ये नाम अमानत नहीं,ठहरे हुए समय की माँग थी
निर्भया तुम निर्भय नहीं निर्भयता की मशाल हो
हाँ निर्भया तुम निर्भय नहीं निर्भयता की मशाल हो












Monday, November 10, 2014

सोच की तदबीर ख़्वाबों की ताबीर


सोच की  तदबीर ख़्वाबों की ताबीर 
गीतांजली गेरा 



सोचा तूने की तू न कम है
तो इस ज़माने में कब दम है
भूला अगर तू खुद को तो
शेर की खूँखार भी कम है



इस नयी सोच की तदबीर कर ले
ख़्वाब की ताबीर को हक़ीक़त में बदल दे


Wednesday, November 5, 2014

बदलता वक़्त


अश्क़ आज कलम की स्याही बन गए
वो गलियां वो चौबारे वीराने हो गए
जो कल ख्वाबों के साये थे
आज ख़ौफ़ में बदल गए

Monday, November 3, 2014

अनजान मुस्कान

अनजान मुस्कान  
गीतांजली गेरा 



कभी कभी अनजान मुस्कान दिल में उतर जाती है
पल भर में कच्चे धागों के रिश्ते बुन जाती है
वो अनजान मुस्कान कभी दिन को नयी पहचान देती है
तो कभी दिन की थकान मिटा देती है 
वो अनजान मुस्कान ग़मों को
बिना कुछ बोले सहला जाती है
वो अनजान मुस्कान....
कभी यहाँ तो कभी वहाँ मिल जाती है  

Wednesday, June 11, 2014

सपने

सपने हम सब देखा करते हैं कुछ करने के, कुछ पाने के कुछ आशाएँ हैं, कुछ उम्मीदें हैँ और कुछ कर गुज़रने की ख्वाइशें हैं   सपना  क्या है?सपना है एक एहसास, ये है एक तमन्नाये है एक आरज़ू, मुश्किल हो सकता है जिसे समझना सपना है एक ऐसी धरोहर, जो सबके पास है जिसमे एक गहरा एहसास है न कोई बंदिश, न कोई टकराव बस एक प्यारा सा सहलाता साथ   हम सबको तलाश है एक मंज़िल की जो चाहे कितनी दूर हो सपने में पास लगती है  सपनों की कोई सीमा नहीं ये वो लहरें हैं, जिन्हें हर वक़्त साहिल की तलाश है ये वो पंछी हैं जिन्हें क्षितिज कोछू जाने की आस है   लेकिन  कुछ सपने टूट जाते हैं चूर होकर बिखर जाते हैं लेकिन कुछ तो हैं जो मंज़िल पाते हैं जीतने का उत्साह बढ़ाते हैं 
तभी सपने हमारे उम्र भर के साथी हैं बिखर कर के भी कुछ सिखाते हैं इसलिए ऐ दोस्त हारना न कभी थकना न कभी और सपने देखना भूलना न कभी क्यूंकि सपने इस ज़िन्दगी की अनोखी पहेली की नींव हैं वो ज़िन्दगी का प्रतिबिंब हैं

 

Tuesday, June 10, 2014

मुलाकात की आस

जब भी ज़िन्दगी की तेज़ रफ़्तार से
फुरसत के दो पल मिले
तो इस नाचीज़ को याद कीजेयगा
मुलाकात छोटी हो लेकिन
हर पल को यादों में समेटिएगा

ज़िन्दगी एक अनोखी पहेली है



लगता है ज़िन्दगी एक अनोखी पहेली है,
कभी गम तो कभी ख़ुशी की सहेली है 
सुलझते सुलझते जो उलझने लगी थी अब उलझते उलझते सुलझने लगी है
आँधियों ने मन को हताशा है मेरे
परेशानियों के बादलों में छिप सी गई हूँ अजनबी अन्तरतम से जूँझते जूँझते
अस्तित्व को जैसे अपने भूल सी गयी हूँ

ज़िन्दगी की ऊँची लहरों से डरने लगी थी पास जाकर अब इनको चूमने लगी हूँ
बारिश के थपेड़ों से थकने लगी थी मानसून की झड़ी में अब हसने लगी हूँ


सिर्फ़ उल्झा है धागा ये टूटा नहीं है
उलझी इस गुत्थी को खोल रही हूँ
पिंजरे से छूटा पंछी हूँ आज 
क्षितिज की दूरी को मिटाके रहूंगी 
लोग कहेंगे मेरी नयी कहानी पुरानी है झूठ है ये, या क्या उनकी बात सही है जो कभी उलझा है, सुलझा वही है क्यूंकि ज़िन्दगी एक अनोखी पहेली है
लगता है ज़िन्दगी एक अनोखी पहेली है,
कभी गम तो कभी ख़ुशी की सहेली है 
सुलझते सुलझते जो उलझने लगी थी अब उलझते उलझते सुलझने लगी है