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Monday, November 10, 2014

सोच की तदबीर ख़्वाबों की ताबीर


सोच की  तदबीर ख़्वाबों की ताबीर 
गीतांजली गेरा 



सोचा तूने की तू न कम है
तो इस ज़माने में कब दम है
भूला अगर तू खुद को तो
शेर की खूँखार भी कम है



इस नयी सोच की तदबीर कर ले
ख़्वाब की ताबीर को हक़ीक़त में बदल दे


Wednesday, November 5, 2014

बदलता वक़्त


अश्क़ आज कलम की स्याही बन गए
वो गलियां वो चौबारे वीराने हो गए
जो कल ख्वाबों के साये थे
आज ख़ौफ़ में बदल गए

Monday, November 3, 2014

अनजान मुस्कान

अनजान मुस्कान  
गीतांजली गेरा 



कभी कभी अनजान मुस्कान दिल में उतर जाती है
पल भर में कच्चे धागों के रिश्ते बुन जाती है
वो अनजान मुस्कान कभी दिन को नयी पहचान देती है
तो कभी दिन की थकान मिटा देती है 
वो अनजान मुस्कान ग़मों को
बिना कुछ बोले सहला जाती है
वो अनजान मुस्कान....
कभी यहाँ तो कभी वहाँ मिल जाती है