लगता है ज़िन्दगी एक अनोखी पहेली है,
कभी गम तो कभी ख़ुशी की सहेली है
सुलझते सुलझते जो उलझने लगी थी अब उलझते उलझते सुलझने लगी है
आँधियों ने मन को हताशा है मेरे
परेशानियों के बादलों में छिप सी गई हूँ अजनबी अन्तरतम से जूँझते जूँझते
अस्तित्व को जैसे अपने भूल सी गयी हूँ
ज़िन्दगी की ऊँची लहरों से डरने लगी थी पास जाकर अब इनको चूमने लगी हूँ
बारिश के थपेड़ों से थकने लगी थी मानसून की झड़ी में अब हसने लगी हूँ
सिर्फ़ उल्झा है धागा ये टूटा नहीं है
उलझी इस गुत्थी को खोल रही हूँ
पिंजरे से छूटा पंछी हूँ आज
क्षितिज की दूरी को मिटाके रहूंगी
लोग कहेंगे मेरी नयी कहानी पुरानी है झूठ है ये, या क्या उनकी बात सही है जो कभी उलझा है, सुलझा वही है क्यूंकि ज़िन्दगी एक अनोखी पहेली है
लगता है ज़िन्दगी एक अनोखी पहेली है,
कभी गम तो कभी ख़ुशी की सहेली है
सुलझते सुलझते जो उलझने लगी थी अब उलझते उलझते सुलझने लगी है


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