नमस्कार
इस चुनतीपूर्ण समय में आप सब के साथ एक बार फिर से मिलने अवसर मिला। इस कवी सम्मेलन में जोर्डने के लिए मैं हिंदी संगम साहित्य और ज़ूम का धन्यवाद् करना चाहती हूँ.
ज़ूम तुझे है गीतांजलि का शत शत कोटि प्रणाम
तूने कराया आज फिर हम सबको इकठे विराजमान
मेरी पहली कविता समर्पित है इरफ़ान खान के लिए जिनके अभिनय की जितनी प्रशंसा की जय उतना काम है। इरफ़ान के शब्दों When life gives you lemon, make lemonade...because it's magical!
नीम्बू की शिकंजी (इर्र्फान खान)
इरफ़ान की इस फ़रियाद को
मक़बूल करना ही पड़ेगा
जब ज़िन्दगी दे नीम्बू
तो शिकंजी को बनाना ही पड़ेगा
आपके लंचबॉक्स में
नीम्बू छोटे हों या बड़े
कच्चे हों या पक्के
नीम्बू तो आपको निचोड़ना ही पड़ेगा
इरफ़ान की इस फ़रियाद को
मक़बूल करना ही पड़ेगा
ज़िन्दगी तो एक कारवाँ हैं
किसका डी-डे कब है
ये तो उस मदारी को ही पता है
इसमें क्या राइट या रॉंग
चाहे ये होपान सिंह की स्टीपलचेस
या फिर बस सिर्फ २४ घंटे की रेस
चाहे आप हो पीकू के ड्राइवर
या हों फिर बिल्लू जैसे बार्बर
चाहे आप हों क़रीब क़रीब सिंगल
या हों फिर माइटी हार्ट वारियर
ये तो सब नेमसेक हैं
सबकी ज़िन्दगी का किस्सा
यूँ होता तो क्या होता
इससे किसी को कुछ हासिल नहीं होता
दोस्तों इस बात को
चाहे हिंदी मीडियम में बोले
या फिर अंग्रेज़ी मीडियम में
जब ज़िन्दगी दे नीम्बू
तो शिकंजी बनानी ही पड़ेगी
इरफ़ान की विदाई मक़बूल करनी पड़ेगी
अब तो ये शिकंजी बनानी ही पड़ेगी
मै अपनी अगली कविता से आप सबको इस चुनातिपूर्ण समय आशावादी दृष्टिकोण रखने के लिए प्रेरित करना चाहती हूँ.
मेरी कविता का शीर्षक है चिल करो ना
चिल करो ना
करो ना करो ना, कुछ तो करो ना
बैठे हूँ क्यों मुँह लटकाये, आशावादी बनो ना
पिज़्ज़ा और आइसक्रीम पारलर बंद है तो क्या है
माँ की याद में आलू परांठें तो खाओ ना
बहामास का टूर कैंसिल हुआ तो क्या है
घर पे हैप्पीनेस क्रूज करो ना
करो ना करो ना, कुछ तो करो ना
मुँह पे पहना है मास्क तो क्या हुआ
आँखों से थोड़ी ख़ुशी बयां करो ना
social डिस्टन्सिंग का फेज है लेकिन
Facetime और wassapp ka advantage to लो ना
ज़िन्दगी ये ना मिलेगी दोबारा
सारे गिले शिकवे तो छोड़ो ना
गले नहीं लगा सकते तो क्या हुआ
आदाब अर्ज़ से ईद मुबारक तो बोलो ना
करो ना करो ना कुछ तो करो ना
बैठे हूँ क्यों मुँह लटकाये, आशावादी बनो ना
हर समय देते थे समय की कमी की दुहायी
अब तो करो इस समय की भरपायी
बैठे हो क्यों खाली, कलम अपनी पकरो ना
दो शब्द अपने लिए, तो दो मेरे लिए तो लिखो ना
अपने हुनर को तराशों दोस्तों
नए स्किल्ल्सेट का अपडेट तो करो ना
अपनी ज़िन्दगी में मतलब तो ढूंढो ना
करो ना करो ना कुछ तो करो ना
अकेले हो लेकिन अकेले नहीं हो
ज़ूम पे सबको नमस्ते/howdy तो बोलो ना
हो सके तो किसी के लिए कुछ तो करो ना
और कुछ नहीं तो एक थैंक यू तो बोलो ना
लाइफ में इतनी टेंशन नहीं दोस्तों
अपने को थोड़ा चिल करो ना
करो ना करो ना कुछ तो करो ना
बैठे हूँ क्यों मुँह लटकाये, आशावादी बनो ना
२०२० को नज़र नहीं लगी दोस्त
आशाओं को चस्मा पहन के तो देखो ना
कोरोना की वायरस सस्कैनिंग है ज़ारी
वायरस deletion तक, स्टे इन होम रहो ना
वायरस vaccine का इंतज़ार है लम्बा
पेशेंस का थोड़ा डिस्प्ले करो ना
ये दशा है गंभीर, इसका हल तो hai dhoondhna
Anthony fauci की जय जय कार करो ना
करो ना करो ना कुछ तो करो ना
इसके साथ में आप सबसे विदा
इस चुनतीपूर्ण समय में आप सब के साथ एक बार फिर से मिलने अवसर मिला। इस कवी सम्मेलन में जोर्डने के लिए मैं हिंदी संगम साहित्य और ज़ूम का धन्यवाद् करना चाहती हूँ.
ज़ूम तुझे है गीतांजलि का शत शत कोटि प्रणाम
तूने कराया आज फिर हम सबको इकठे विराजमान
मेरी पहली कविता समर्पित है इरफ़ान खान के लिए जिनके अभिनय की जितनी प्रशंसा की जय उतना काम है। इरफ़ान के शब्दों When life gives you lemon, make lemonade...because it's magical!
नीम्बू की शिकंजी (इर्र्फान खान)
इरफ़ान की इस फ़रियाद को
मक़बूल करना ही पड़ेगा
जब ज़िन्दगी दे नीम्बू
तो शिकंजी को बनाना ही पड़ेगा
आपके लंचबॉक्स में
नीम्बू छोटे हों या बड़े
कच्चे हों या पक्के
नीम्बू तो आपको निचोड़ना ही पड़ेगा
इरफ़ान की इस फ़रियाद को
मक़बूल करना ही पड़ेगा
ज़िन्दगी तो एक कारवाँ हैं
किसका डी-डे कब है
ये तो उस मदारी को ही पता है
इसमें क्या राइट या रॉंग
चाहे ये होपान सिंह की स्टीपलचेस
या फिर बस सिर्फ २४ घंटे की रेस
चाहे आप हो पीकू के ड्राइवर
या हों फिर बिल्लू जैसे बार्बर
चाहे आप हों क़रीब क़रीब सिंगल
या हों फिर माइटी हार्ट वारियर
ये तो सब नेमसेक हैं
सबकी ज़िन्दगी का किस्सा
यूँ होता तो क्या होता
इससे किसी को कुछ हासिल नहीं होता
दोस्तों इस बात को
चाहे हिंदी मीडियम में बोले
या फिर अंग्रेज़ी मीडियम में
जब ज़िन्दगी दे नीम्बू
तो शिकंजी बनानी ही पड़ेगी
इरफ़ान की विदाई मक़बूल करनी पड़ेगी
अब तो ये शिकंजी बनानी ही पड़ेगी
मै अपनी अगली कविता से आप सबको इस चुनातिपूर्ण समय आशावादी दृष्टिकोण रखने के लिए प्रेरित करना चाहती हूँ.
मेरी कविता का शीर्षक है चिल करो ना
चिल करो ना
करो ना करो ना, कुछ तो करो ना
बैठे हूँ क्यों मुँह लटकाये, आशावादी बनो ना
पिज़्ज़ा और आइसक्रीम पारलर बंद है तो क्या है
माँ की याद में आलू परांठें तो खाओ ना
बहामास का टूर कैंसिल हुआ तो क्या है
घर पे हैप्पीनेस क्रूज करो ना
करो ना करो ना, कुछ तो करो ना
मुँह पे पहना है मास्क तो क्या हुआ
आँखों से थोड़ी ख़ुशी बयां करो ना
social डिस्टन्सिंग का फेज है लेकिन
Facetime और wassapp ka advantage to लो ना
ज़िन्दगी ये ना मिलेगी दोबारा
सारे गिले शिकवे तो छोड़ो ना
गले नहीं लगा सकते तो क्या हुआ
आदाब अर्ज़ से ईद मुबारक तो बोलो ना
करो ना करो ना कुछ तो करो ना
बैठे हूँ क्यों मुँह लटकाये, आशावादी बनो ना
हर समय देते थे समय की कमी की दुहायी
अब तो करो इस समय की भरपायी
बैठे हो क्यों खाली, कलम अपनी पकरो ना
दो शब्द अपने लिए, तो दो मेरे लिए तो लिखो ना
अपने हुनर को तराशों दोस्तों
नए स्किल्ल्सेट का अपडेट तो करो ना
अपनी ज़िन्दगी में मतलब तो ढूंढो ना
करो ना करो ना कुछ तो करो ना
अकेले हो लेकिन अकेले नहीं हो
ज़ूम पे सबको नमस्ते/howdy तो बोलो ना
हो सके तो किसी के लिए कुछ तो करो ना
और कुछ नहीं तो एक थैंक यू तो बोलो ना
लाइफ में इतनी टेंशन नहीं दोस्तों
अपने को थोड़ा चिल करो ना
करो ना करो ना कुछ तो करो ना
बैठे हूँ क्यों मुँह लटकाये, आशावादी बनो ना
२०२० को नज़र नहीं लगी दोस्त
आशाओं को चस्मा पहन के तो देखो ना
कोरोना की वायरस सस्कैनिंग है ज़ारी
वायरस deletion तक, स्टे इन होम रहो ना
वायरस vaccine का इंतज़ार है लम्बा
पेशेंस का थोड़ा डिस्प्ले करो ना
ये दशा है गंभीर, इसका हल तो hai dhoondhna
Anthony fauci की जय जय कार करो ना
करो ना करो ना कुछ तो करो ना
बैठे हूँ क्यों मुँह लटकाये, आशावादी बनो ना
इसके साथ में आप सबसे विदा